पति की गैरमौजूदगी मे मैं और मेरा आशिक़





महेश हर दिन की तरह ऑफिस से शाम 7:00 बजे घर लौटे महेश जब घर आए तो उनके चेहरे पर वह खुशी नहीं थी जो कि पहले रहती थी महेश का चेहरा बिल्कुल उतरा सा था। मैंने महेश से पूछा महेश क्या मैं आपके लिए चाय बना कर ले आऊं तो महेश कहने लगे हां तुम मेरे लिए चाय बना कर ले आओ। मैं रसोई में गई और उनके लिए चाय बना कर ले आई मैंने जब महेश के लिए चाय बनाई तो मैंने उनके हाथ में गरमा गरम चाय का प्याला थमाया। जब मैंने उन्हें चाय दी तो वह कहने लगे चाय में तो बड़ी अच्छी खुशबू आ रही है मैंने उन्हें कहा मैंने चाय में इलायची और अदरक डाला है तो खुशबू तो आएगी ही। इस बात से महेश के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आई लेकिन वह मुस्कान सिर्फ कुछ ही पल की थी उसके बाद वह दोबारा से जैसे गुमसुम से हो गए।

वह चाय की चुस्कीयां ले रहे थे लेकिन उनका ध्यान पता नहीं कहां था मैंने खांसते हुए उन्हें अपनी ओर देखने के लिए मजबूर कर दिया उन्होंने अपने चश्मे को उतारकर मेज पर रखा और मुझे कहने लगे राधिका लगता है हमें फिर अपना सामान बांधना पड़ेगा। मैंने महेश से कहा क्या आप का ट्रांसफर हो गया है तो महेश कहने लगे हां मेरा ट्रांसफर हो गया है मैंने महेश से कहा लेकिन इस बार आपका ट्रांसफर बड़ी जल्दी हो रहा है हमें तो अभी अजमेर में सिर्फ दो वर्ष ही हुए हैं। महेश कहने लगे अब अपने विभाग के बारे में क्या कहूं जब मन करता है तो वह लोग ट्रांसफर करवा देते हैं हमारा ट्रांसफर पुणे में हो गया है। मैंने महेश से कहा तो फिर बच्चों का भी अब दाखिला पुणे में ही करवाना पड़ेगा यह भी हमारे लिए बड़ी ही विडम्बना वाली स्थिति थी क्योंकि हर दो-तीन वर्ष में हमारा ट्रांसफर होता रहता था। बच्चों को भी नए स्कूल में दाखिला दिलवाना था और मुझे तो सबसे पहले सामान बांधने की चिंता हो रही थी सामान भी काफी जुड़ चुका था और अब हम लोग इस बात से परेशान थे कि कैसे सामान को इतने दूर लेकर जाएंगे। अजमेर से पुणे की दूरी काफी थी तो कुछ दिनों के लिए महेश पुणे हो आए थे महेश जब पुणे से लौटे तो उन्होंने बताया कि वहां पर रहने के लिए तो सरकारी क्वार्टर बडे ही अच्छे हैं और व्यवस्थाएं भी अच्छे से हैं लेकिन महेश को वहां पर अच्छा नहीं लग रहा था।

महेश वापस अजमेर लौट आए थे जब महेश वापस लौटे तो महेश मुझे कहने लगे राधिका तुमने सामान तो बांध दिया है ना मैंने महेश से कहा बस थोड़ा टाइम और लगेगा तुम्हें मालूम है ना कितना सामान है सामान को बंधने में बड़ी तकलीफ हो रही है। महेश और मैंने मिल कर सामान अच्छे से पैक कर लिया था अब हम लोगों को पुणे के लिए निकलना था तो हम लोग ट्रेन से चले गए और महेश ने एक बड़ा ट्रक बुक कर लिया था उसमें ही हम लोगों ने सारा सामान रखवा दिया। जब हम लोग पुणे पहुंचे तो हमारे पड़ोस में रहने वाली निकिता दीदी ने हमारी बड़ी मदद की उनके ही मदद से मैं घर का सारा सामान अच्छे से रख पाई। मैंने अब अपने सामान को अच्छे से रख दिया था मुझे इस बात की बहुत खुशी थी कि चलो कम से कम किसी ने तो मेरी मदद की। काफी दिन तक तो हम लोगों को एडजस्ट करने में दिक्कत हुई पर अब हम लोग एडजेस्ट कर चुके थे लेकिन इस बात की समस्या थी कि बच्चों का दाखिला कब करवाया जाए। कुछ ही दिन में यह समस्या भी हमारी हल हो गई और हम लोगों ने बच्चों का दाखिला भी करवा दिया था। महेश अब अपने ऑफिस से आते तो वह मुझे कहते यहां एडजस्ट करने में मुझे तो बड़ी दिक्कत हो रही है मैंने महेश से कहा लेकिन यहां अच्छा तो है। महेश कहने लगे अच्छा तो है लेकिन ऑफिस में कुछ लोग बड़े ही ढीट किस्म के हैं यदि उनसे कुछ काम करने के लिए बोलो तो वह मुंह चढ़ा लेते हैं। मैंने महेश से कहा कोई बात नहीं सब ठीक हो जाएगा और महेश भी कुछ दिनों बाद अच्छे से एडजस्ट करने लगे थे। हालांकि महेश का मन तो नहीं था परंतु फिर भी महेश ने एडजेस्ट कर ही  लिया था, महेश अपने ऑफिस में एक उच्च अधिकारी के पद पर थे। मेरी सासू मां ने एक दिन मुझे फोन किया और कहने लगी बेटा मैंने महेश को फोन किया था लेकिन वह फोन नहीं उठा रहा है मैंने सासू मां से कहा मां जी क्या कोई जरूरी काम था।

वह कहने लगीन हां महेश को मुझे बताना था कि उसके पिताजी की कुछ दिनों से तबियत ठीक नहीं है तो क्या वह कुछ दिनों की छुट्टी लेकर घर आ सकता है। मैंने माजी से कहा माजी महेश जब ऑफिस से आ जाएंगे तो मैं उन्हें बता दूंगी और मैं उनकी बात आपसे करवा दूंगी। वह कहने लगी ठीक है बेटा जब महेश ऑफिस से आए तो तुम महेश से मेरी बात करवा देना मैंने फोन रख दिया था मैंने जैसे ही फोन रखा तो बच्चे भी स्कूल से आ चुके थे। बच्चों को बहुत तेज भूख लग रही थी तो वह कहने लगे मम्मी कुछ बना दो मैंने उनके लिए गरमा गरम पकौड़े बना दिए बच्चों को पकोड़े खाने का बड़ा शौक है वह लोग पकोड़े खा कर खुश थे। श्याम के वक्त जैसे ही महेश आये तो मैंने महेश को कहा आज माजी का फोन आया था तो माजी कह रही थी कि पिताजी की तबीयत कुछ ठीक नहीं है क्या आप उन्हें फोन कर देंगे। महेश ने अपने फोन को अपने जेब से निकाला और कहने लगे मेरे दिमाग से उतर गया था जिस वक्त मां का फोन आ रहा था उस वक्त मैं अपने ऑफिस का कुछ जरूरी काम कर रहा था इसलिए मेरे दिमाग से यह बात उतर गई। मैंने महेश से कहा आप फोन कर लीजिए महेश ने माजी को फोन किया और वह उनसे फोन पर बात करने लगे।

मैं महेश के पास ही बैठी हुई थी हम दोनों अपने बैठक में बैठे हुए थे और महेश की करीब 5 मिनट तक अपनी मां से बात हुई महेश कहने लगे लगता है मुझे कुछ दिनों के लिए घर जाना पड़ेगा। महेश को कुछ दिनों के लिए अंबाला जाना था तो महेश कहने लगे मैं कुछ दिनों के लिए अंबाला हो आता हूं तुम बच्चों का ध्यान रख लोगी ना। मैंने महेश से कहा हां मैं बच्चों का ध्यान रख लूंगी तुम निश्चिंत रहो लेकिन पहले यह तो बताओ आखिर हुआ क्या है। महेश मुझे कहने लगे पिताजी की तबीयत कुछ दिनों से खराब चल रही है और मां चाहती है कि मैं भी घर आ जाऊं मैंने महेश से कहा तो क्या तुम्हारे छोटे भाई को उन्होंने नहीं बताया। महेश कहने लगे तुम्हें तो उसके बारे में मालूम हीं है ना वह कितना लापरवाह है उसे अपने आप से ही फुर्सत नहीं है तो भला वह क्या मां और पापा का ख्याल रखेगा। यह कहते हुए महेश अपने कपड़े चेंज करने के लिए रूम में चले गए और थोड़ी देर बाद वह बाहर आये तो कहने लगे मैं सोच रहा हूं कि परसों ही मैं निकल जाऊं। मैंने महेश से कहा ठीक है आप देख लीजिए आपको जैसा सही लगता है तो महेश कहने लगे ठीक है मैं परसों ही निकल जाता हूं। उसके बाद महेश ट्रेन से अंबाला के लिए निकल चुके थे मैं घर में बच्चों के साथ अकेली थी। मैं घर पर अकेली थी लेकिन मुझे महेश ने अंबाला पहुंच कर फोन कर दिया था और जब महेश अंबाला पहुंच गए थे तो मैंने उन्हें कहा था कि आप अपना ध्यान रखिएगा। वह मुझे कहने लगे  तुम भी अपना ध्यान रखना और यदि कोई परेशानी हो तो मुझे बता देना। मैंने महेश को कहा हां यदि मुझे कोई परेशानी होगी तो जरूर मैं तुम्हें बता दूंगी और इसी के साथ मैं महेश की यादों में अपने रूम में बैठी हुई थी बच्चे भी स्कूल जा चुके थे।

मुझे काफी अकेलापन सा महसूस हो रहा था और अकेलापन महसूस होता भी क्यों नहीं क्योंकि मेरे अंदर भी जवानी अब भी बची हुई है उसे मुझे बाहर निकालना ही था। उसे बाहर निकालने के लिए मैंने सोचा क्या किया जाए तो मैं इधर उधर देखने लगी मैंने कुछ देर देखा तो मुझे कुछ नहीं मिला फिर मैंने अपने घर पर रखे बैंगन को ही अपनी चूत के अंदर घुसा दिया। मुझे बड़ा मजा आया काफी देर तक मैं उस बैगन के साथ मजे लेकर अपनी इच्छा को पूरी करती रही। उस दिन तो मेरी इच्छा पूरी हो चुकी है लेकिन उसके बाद भी मुझे किसी ना किसी की तो जरूरत थी तो हमारे कॉलोनी में रहने वाले साकेत के साथ मैंने शारीरिक संबंध बनाने के बारे में सोचा। साकेत अभी बैचलर है वह मुझसे मिलने आए तो उन्होंने मेरे होठों को चूसा और मेरे स्तनों का भी जमकर रसपान किया। जब उन्होंने मेरी योनि को चाटना शुरू किया तो मुझे मज़ा आने लगा और वह भी पूरी तरीके से आनंदित होने लगे मैंने भी उनके मोटे लंड को अपने मुंह में लेकर चूसना शुरू किया तो साकेत को भी मजा आने लगा और मुझे भी मज़ा आ रहा था। साकेत ने अपने लंड को मेरी योनि में डाला तो मेरी चूत से गर्मी बाहर निकलती।

काफी समय से अच्छी तरीके से मेरी इच्छा पूरी नही हो पाई थी। मैंने साकेत से कहा तुम और तेजी से मुझे धक्के दो साकेत ने मुझे बड़े ही तेजी से धक्के मारे और काफी देर तक वह मेरी चूत के मजे लेता रहा लेकिन जब मेरी योनि से पानी बाहर निकाला है तो वह कहने लगा लगता है अब मैं आपको नहीं चोद पाऊंगा परंतु उसके बावजूद भी साकेत ने मुझे धक्के दिए और कहा मेरा वीर्य गिरने वाला है। साकेत मेरी चूत की गर्मी को बर्दाश्त नहीं कर पाया और साकेत ने अपने वीर्य को मेरी योनि के अंदर गिरा दिया। साकेत अगले दिन भी मुझसे मिलना आया तो मैंने उससे अपनी चूत दोबारा से मरवाई लेकिन मुझे अपनी गांड मारवानी थी। साकेत ने अपने लंड पर  कंडोम चढ़ाते हुए मेरी गांड के अंदर प्रवेश करवाया तो मैं मचलने लगी और मुझे दर्द होने लगा था लेकिन साकेत अपने लंड को मेरी गांड के अंदर बाहर करता तो मेरे मुंह से चीख निकल जाती लेकिन मुझे मजा आ रहा था। साकेत काफी देर तक ऐसा ही करते रहे मेरी  गांड की गर्मी से कंडोम फट चुका था और वीर्य मेरी गांड मे गिर गया था।


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